मुगल, हिंदू राजा और अंग्रेज
इतिहासकार लिखते हैं कि जब मुगलों को लेकर सोशल मीडिया पर बहस हो रही है तो इसका जिक्र होना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस पर मैंने एक वीडियो पोस्ट किया तो बहुत से लोगों ने प्रतिक्रिया दी कि मुगल बहुत हिंसक थे जबकि हिंदू राजा धर्मपरायण और अच्छे थे। जबकि वास्तविकता यह है कि सत्ता के साथ हिंसा साथ-साथ चलती रही है। यह ब्रिटिश काल तक जारी रही। 1860 के दशक में अंग्रेज तोप के आगे खड़ाकर लोगों को उड़ा दिया करते थे। उनके चीथड़े आसमान में उड़ जाते थे।
पिल्लई लिखते हैं कि भारत में राजनीतिक हिंसा कभी कम नहीं रही। मुगलों से काफी पहले लिखे गए ‘अर्थशास्त्र’ में राजा के लिए हत्या वैध विकल्प कहकर बताया गया था और अपराध के लिए कुछ भयानक सजा देने का भी जिक्र है। उपिंदर सिंह की किताब प्राचीन भारत में राजनीतिक हिंसा (2017) में बताया गया है कि कैसे जिंदा जला दिया जाता था और टुकड़े कर दिए जाते थे। बाद में राजद्रोह कानून के तहत ऐसी सजा दी जाने लगी। त्रावणकोर में 1800 के शुरुआत सालों में, एक मंत्री को स्थानीय शख्स चुनौती दे रहा था। वह उसे सत्ता से हटाना चाहता था। उसके दो पैरों को दो हाथियों से बांधकर शरीर के दो टुकड़े कर दिए गए थे। अग्रेंजों ने विद्रोह के लिए मंत्री को हटा दिया और उसका पार्थिव शरीर कई दिनों तक टंगा रहा जिससे जनता में खौफ पैदा हो सके।
बेटे की आंख फोड़ दी, भाइयों की हत्या
राजनीतिक राजवंशों के भीतर हिंसा होती रही है। दुनियाभर में ऐसे उदाहरण हैं लेकिन भारत में हम गद्दी पाने के लिए किए गए मुगलों के ही कारनामों का उदाहरण देते हैं- जहांगीर ने अपने ही बेटे को अंधा करा दिया, औरंगजेब ने अपने सभी भाइयों की हत्या करा दी। लेकिन इससे भी काफी पहले विजयनगर में एक भाई या भतीजे (रिश्ता स्पष्ट नहीं है) ने देवराय द्वितीय के खिलाफ ऐसा करने की कोशिश की थी लेकिन साजिश फेल रही। विरोधी का सिर कलम कर खुलेआम घुमाया गया। उनके उत्तराधिकारी विरुपक्ष द्वितीय का किस्मत ने साथ नहीं दिया। उनके बेटे ने ही राजा की हत्या कर दी।
यही नहीं, महिलाओं के खिलाफ भी हिंसा होती थी। मुगल जंग में हारे हिंदू राजाओं की पत्नियों को छीन लेते थे। इसे वह प्राइज के तौर पर समझते थे। उन्होंने दक्कन के सुल्तान के साथ भी ऐसा ही किया था। विजयनगर के कृष्णदेवराय ने ओडिशा के गजपति को हराया और उनकी बेटी को छीन लिया। बलात्कार संघर्ष के दौरान खौफ पैदा करने का तरीका बन गया था।
इतिहासकार ने चोल-चालुक्य संघर्ष, मराठाओं के राज में भी हिंसा की चर्चा की है। वह कहते हैं कि राजा की पदवी हिंसा से जुड़ी होती थी और यह सब सार्वजनिक था। 19वीं शताब्दी में मैसूर में नगरा विद्रोह के समय महाराज के दूतों की वीरशैवों द्वारा हत्या कर दी गई थी। दिलचस्प है कि एक सदी पहले मैसूर के एक राजा ने सैकड़ों वीरशैव धार्मिक लोगों की हत्या करा दी थी जबकि उन्हें एक सम्मेलन के लिए बुलाया गया था। आखिर में इतिहासकार कहते हैं कि वे मुगल थे इसलिए हिंसक नहीं थे, ऐसा इसलिए था क्योंकि वे रॉयल यानी राजा थे।